मां बनकर और मजबूत हुई हूं मैं

मां बनकर और मजबूत हुई हूं मैं

मां बनने का अहसास सभी अहसासों से परे होता है। एक नन्हीं सी जान को इस दुनिया में लाना, उसे चलना सिखाना, उसे एक जीवन देना किसी कल्पना से परे हो सकता है लेकिन एक औरत के लिए यह कल्पना नहीं वास्तविकता होती है। एक मां बनने के बाद अक्सर सबको लगता है कि औरत केवल अब बच्चों में घिर कर रह जाएगी या शयद उस तरह से आजाद ना रहे जैसा वह पहले रहती थी। पर क्या यह वाकई सच है? चाहे किसी के लिए कुछ भी हो पर मेरे लिए तो नहीं। मैंने तो खुद को और आजाद एक मां बनने के बाद ही पाया है। शायद यह सब सोच का असर है या मेरी खुद के ख्यालों का।

 

कठिन थी राह पर मंजिल थी खुशगवार

एक आंखों के पास है, एक आंखों से दूर

बेटा हीरा होता है और बेटी कोहीनूर

 

किसी शायर की यह लाइनें शादी के बाद मेरे जीवन पर सटिक बैठती हैं। मेरी मां के लिए मैं किसी कोहीनूर से कम नहीं हूं। ना कल थी ना आज हूं। हमारे समाज में एक स्त्री को शादी से पहले पूर्ण नहीं माना जाता और शादी के बाद शादी को पूर्ण मानने के लिए पत्नी से मां बनना जरूरी होता है। मेरे जीवन में भी यह पड़ाव आया और तब मैंने जाना कि मां की जूतियों में पांव डालने का क्या अर्थ होता है?

 

नॉर्मल डिलीवरी जिसने जिंदगी बनाई मैजिकल

मेरी डिलीवरी एकदम नॉर्मल हुई। जितनी सरलता से मैंने यह बात लिखी है यकिन मानिए उतनी ही परेशानी मुझे उस समय हुई थी। उस अथाह दर्द का वर्णन शब्दों में नहीं कर सकते। पुरुष प्रधान हमारा समाज उस दर्द को शायद कभी समझ ही नहीं सका इसलिए वह हर समय यह आंकने की कोशिश करता है कि एक औरत कितनी मजबूत है और कितनी नहीं?

डिलीवरी के बाद कई लोगों ने कहा कि अब मां बन गई हो जिम्मेदारियां आ गई है, खुद को बांधो, बच्चे को पालो। यह सलाह कम मुझे लोगों की अंदर की आवाज लगती थी जो कह रही हो कि अब तुम उस आजाद पंक्षी की तरह नहीं रही जिसे कहीं भी उड़ने की आजादी हो। तुम्हें ना सिर्फ अपने कोख में पले अपने बच्चे को बड़ा करना है बल्कि उसे जीवन के आने वाले संघर्षों के लिए मजबूत भी बनाना है।

एक दिन ने बदली मेरी लाइफ

मेरे बेटे के जन्म के एक महीने बाद मेरे सामने एक ऐसी स्थिति आई जिसने मुझे अंदर से काफी मजबूत बनने की और अग्रसर किया। उस दिन मेरे बच्चे को काफी तेज बुखार था। घर में मां कहीं बाहर गई थी और मेरे पति के ऑफिस में एक मीटिंग थी तो उनका फोन दिनभर बंद रहने वाला था। डिलीवरी को हुए अभी एक महीना ही हुआ था तो अकेले डॉक्टर के पास जाना मुमकिन नहीं था। सुबह से दिन और दिन से शाम होने को आ रही थी। बुखार कमोबेश उसी तरह था। अपने बच्चे के जलते बदन को देखकर मेरी आंखों की नमी कम ही नहीं हो रही थी। लेकिन फिर पता नहीं क्या हुआ मैंने फटाफट से कपड़े बदले और खुद से सवाल किया कि क्या मैं मां बनने के बाद कमजोर हो गई हूं?

तब कैब बुकिंग का दौर नहीं था, आपको बाहर जाकर ऑटो ही लेना पड़ता था। मैं डॉक्टर के पास गई, रास्ते में मां भी मिल गई। शाम को जब घर वापस आई तो चाय पीते हुए मैंने खुद से कहा कि सुबह तक जो मैं इस बात से डर रही थी कि अपने एक महीने के बच्चे को मैं गोद में कैसे लूंगी अब उसे मैं खुद डॉक्टर के पास ले जाकर वापस भी ले आई थी। मेरी मां ने मुझसे वह बात कही जिसे शायद मैं जिंदगी भर ना भूलूं कि बच्चे खुद नहीं पलते बल्कि उन्हें पालना पड़ता हैं और यह पालने का काम भगवान नें मां को इसीलिए दिया है क्योंकि एक मां ही दुनिया की सबसे मजबूत प्राणी है। अगर तुम अपने बच्चे को नौ महीने पेट में रख सकती हो तो यकिन मानों कोई भी काम कर सकती हो। यह मजबूती मुझे उस दिन मेरी मां ने दी थी जिसे मैं आज भी अपने बच्चे को देने की कोशिश करती हूं।

 

खुद की मजबूती उसमें डालने की कोशिश

किसी को कुछ सिखाने से पहले खुद को उसको साकार करना बेहद आवश्यक होता है। मैंने अपने मन में पहले से सोच रखा था कि अपने बेटे के आगे में मां के पारंपरिक रूप को नहीं बल्कि एक मॉर्डन, सही मायनो में आजाद मां का मॉडल रखूंगी। एक ऐसी परवरिश दूंगी जहां उसे एक मां की मजबूती को पहचानने या जानने के लिए नेट का सहारा ना लेना पड़े। अंत में एक बार फिर किसी लेखक की कुछ लाइनें मुझे याद आ रही है जिसके बिना शायद यह कहानी पूरी ना हो:

 

मां से सीखा है मैंने,

कांटो में पलने का सलीका

टूट कर बिखरने का गम नहीं

खिलकर महकने का सलीका!

मां की तरह खूबसूरत,

गुलाब बनने का सलीका!

 

(यह कहानी प्रेगा न्यूज द्वारा प्रायोजित है।)

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