मैं से माँ तक का सफर- कितना मुश्किल कितना आसान

मैं से माँ तक का सफर- कितना मुश्किल कितना आसान

मैं कौन हूँ? मैं अपने पापा की परी, माँ की लाडली, एक चुलबुली सी हंसमुख मिजाज की लड़की थी। पता नहीं कितने नाम थे मेरे बचपन में| पापा मम्मी बहुत ही प्यार करते थे हालांकि पापा की आर्थिक स्थिति ठीक-ठीक थी पर फिर भी मम्मी पापा ने हम बहन भाइयों का पालन-पोषण बहुत अच्छे से किया। कहते हैं प्यार जताने के लिए पैसों की नहीं भावनाओं की जरूरत होती हैं। गुड्डे गुड़िया से खेलना, भाग दौड़ करना, खूब मौज मस्ती करना, ना कोई चिंता ना कोई फिक्र, सचमुच एक राजकुमारी जैसी फीलिंग आती थी। खेलते-खेलते मौज मस्ती करते करते कब बड़े हो गए पता ही नहीं चला।
मैं से माँ तक का सफर- कितना मुश्किल कितना आसान

और ऐसे ही एक दिन मेरी शादी हो गई। शादी क्या हुई ऐसा लगा जैसे सब कुछ ही बदल गया| नया शहर, नए लोग, नए विचार मुझे तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। कहां वह हंसती-खेलती सारा दिन शोर मचाने वाली लड़की अब एकदम से शांत हो गई, एक जिम्मेदारी जो आ गई थी| नए-नए रिश्ते बन गए, एक बहू का, पत्नी का, भाभी का कितने रिश्ते निभाने थे| अब तक तो इन रिश्तों को नहीं समझ पाई थी कि एक साल बाद ही मुझे एक बेटा हुआ| बहुत ही प्यारा कृष्णा और मैं भी माँ बन गई जो कि दुनिया में सबसे पावन, सबसे प्यारा और सबसे अनोखा रिश्ता होता हैं और उस दिन मुझे लगा आज मैं एक संपूर्ण नारी बन गई हूँ। जब मेरे बेटे ने मुझे अपने छोटे-छोटे और मुलायम हाथों से छुआ, उस अहसास को मैं बया नही कर सकती|

उसके बाद मुझे दो बहुत ही प्यारी-प्यारी बेटियाँ हुई मीरा और शेफाली| अब तो मेरी जिंदगी बिल्कुल ही बदल गई थी, बच्चों के प्रति प्यार ममता के साथ-साथ जिम्मेदारियाँ बहुत बढ़ गई थी| जिम्मेदारी जो मुझे एक बहू के रूप में, एक पत्नी के रूप में और एक माँ के रूप में अच्छे से पूरी करनी थी| शादी के बाद मेरा सारा समय मेरे परिवार को समर्पित रहा। तीनों बच्चों की देखभाल और घर के कामकाज। कैसे समय निकल जाता पता ही नहीं चलता था।

अपने लिए तो समय ही नहीं मिल पाता था। शादी से पहले म्यूजिक सुनना, न्यूज़पेपर और मैगजीन पढ़ना घूमना आदि काफी शौक थें। पर शादी के बाद जैसे सब कुछ पीछे छूट गया था| परंतु मैंने भी आज अपने बच्चों के लिए जीना सीख लिया था। यूँ समझो बच्चों में मेरी जान बसती थी। मेरी दुनिया ही मेरे बच्चे थे।

धीरे-धीरे समय बीतता गया अब तीनों बच्चे पढ़ने लगे और स्कूल जाने लगे थे| जब पहली बार मेरे बेटे के स्कूल में अच्छे नंबर आने पर इनाम में एक पुस्तक और एक पेन मिला और दोनों बेटियों को भी अच्छे नंबर आने पर मेडल मिले तो मेरी तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। ऐसे लगने लगा जैसे मैं अपना बचपन देख रही हूँ। और बस बोरियत भरी जिंदगी में लहरे दौड़ने लगी। जब मेरे बच्चे स्कूल के फंक्शन में डांस करते हैं, खेलकूद में भाग लेते हैं, तब उनकी आंखों में खुशी देखकर और उनका आत्मविश्वास देखकर मेरी खुशी का ठिकाना ही नहीं रहता था।

लेकिन बहुत सपने भरें थे मेरी आंखों में, ऐसे न जाने कितने छोटे बड़े किस्से हैं जो मुझे सिर्फ और सिर्फ एक माँ की दहलीज पर लाकर खड़ा कर देते हैं। कभी-कभार लगातार चलते इन कामों से एक खीज जरुर उत्पन्न होती और उस वक्त अपनी माँ की भी याद आती कि कैसे मेरी माँ भी अपनी इच्छाओं को मारकर सिर्फ और सिर्फ हमारे लिए जीती थी। परंतु मैं जब भी इतनी खीज के बाद, अपने प्यारे बच्चों की एक प्यारी सी मुस्कान, एक छोटा सा प्यारा सा आलिंगन, एक छोटी सी मासूम सी जिद देखती तो वह उस खीज पर भारी पड़ती और यही सोचती कि एक लड़की जो सिर्फ अपने तक ही सीमित होती हैं, कैसे वह माँ बन कर अचानक ऑलराउंडर बन जाती हैं। हर उम्र में, हर हाल में कभी गाइड बनकर, कभी दोस्त बनकर तो कभी हिम्मत बनकर अपने बच्चों के साथ खड़ी होती है माँ। उसके प्यार दुलार, डांट-फटकार और उसकी चिंता हम तब तक समझ नहीं पाते जब तक हम खुद उसकी जगह पर ना पहुंच जाएं। इसलिए कहीं भी जाने का या घूमने फिरने का प्रोग्राम इसलिए बनाती थी कि बच्चों को अच्छा लगे, बच्चे इंजॉय करेंगे, खाने में भी बच्चों की पसंद को ही अपनी पसंद बना लेती थी। उनको चाव से खाते हुए देख कर मेरा पेट और मन दोनों ही भर जाते थे। और कई बार चीज कम होती तो कह देती कि यह तो मुझे अच्छी नहीं लगती और अपने बच्चों को ही खिला देती।

एक कामकाजी स्त्री का जीवन हमेशा से ही चुनौतियों से भरा हुआ होता हैं। घर पर संतुलन बनाए रखने की चुनौती, बच्चों को अच्छी परवरिश देने की चुनौती, रिश्तो को बेहतर तरीके से निभाने की चुनौती, आदि सब में स्त्री को संघर्ष की कसौटी पर खरा उतरना होता हैं। लेकिन इन सबके बीच जीवन के विस्तार का कोई कोना अगर छूट जाता हैं तो वह कहीं ना कहीं अपने आप को ही दोषी समझती हैं।

चलो धीरे-धीरे समय बीतता गया| आज मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं| बच्चे बड़े होकर अपने-अपने काम में लग गए| बेटा और बड़ी बेटी जॉब पर लग गए और छोटी बेटी कॉलेज में जाने लगी| अब मेरा काम पहले से कम हो गया और खाली घर और खाली समय मुझे सताने लगा| ऐसे में मेरे प्यारे पतिदेव और मेरे प्यारे प्यारे बच्चों ने मुझे प्रोत्साहित किया कि मैं कुछ काम कर लूँ ताकि मन लगा रहे| लेकिन समझ नहीं आया कि क्या करूं|

सोचते-सोचते काफी समय निकल गया और अब मेरी शादी को 27 साल होने वाले हैं। चूँकि मुझे लिखने का शौक था और एक दिन बेटे कृष्णा ने मुझे कहा मम्मी आप लेख लिखना शुरु कर दो और उसी से उत्साहित होकर, मैंने अपने पति और अपनी दोनों बेटियों के सहयोग से लिखना शुरु कर दिया| मैंने अपना एक लेख बेबी डेस्टिनेशन के लिए लिखा और पहला लेख 2 अप्रैल को जब बेबी डेस्टिनेशन में छपा तो मैं जैसे अपने आप को ऊर्जा से भरपूर व तरोताजा महसूस करने लगी। मैं तहे दिल से अपने पति, अपने बच्चों की ओर बेबी डेस्टिनेशन की शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने मुझे एक नई जिंदगी दी, मुझे जीना सिखाया और एहसास दिलाया कि मैं भी रसोई और घर के काम के अलावा अपनी जिंदगी में कुछ कर सकती हूँ। और आज मैं बहुत खुश हूँ| आज मेरी जिंदगी में मेरा साथ देने वाले मुझे मेरी मंजिल तक पहुंचाने में सहयोग देने वाले मेरे पति और मेरे बच्चे हैं। और असल में यही मेरी कमाई और यही मेरी जीत है।

तो ऐसा हैं मेरा मैं से माँ तक का सफर अद्भुत, अलौकिक, पूर्ण रूप से जीवंत और रोमांचक।

धन्यवाद

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